देवब्रत मंडल

किसी भी मीडिया हाउस के पत्रकारों को खबर की भूख होती है। हो भी क्यों नहीं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ का दर्जा जो प्राप्त है। ऐसे में लोकतंत्र की लाज को बचाए रखने के लिए जितने यत्न पत्रकार करते हैं उतना शायद लोकतंत्र के शेष स्तंभ नहीं। यही वजह है आम नागरिक आज पहले पत्रकार को सूचना देते हैं। बाद में लोकतंत्र के शेष प्रहरियों को। पत्रकारिता का धर्म भी है कि अपने आसपास होने वाली घटनाओं की सूचना संकलन करें और फिर लोकतंत्र की रक्षा के लिए उन बातों को सभी के सामने रखें ताकि जनता और प्रशासन के बीच संवाद में कोई शून्यता नहीं रहे।
आजकल मीडिया हाउस के पत्रकारों में थोड़ी बहुत शिथिलता सी मानो आ गई है। इसके पीछे असली वजह यह है कि संचार क्रांति के हम सभी ऐसे युग में जी रहे हैं जहां पल-प्रतिपल घटित हो रही घटनाओं की सूचना पलक झपकते ही सभी को मिल ही जाती है म भले ही किसी तक पहुंचने में देरी हो लेकिन देर सवेर सभी को पता चल ही जाता है। इसलिए मीडिया हाउस के पत्रकारों को घर बैठे ही कई जानकारियां उपलब्ध हो जाती है। चाहे सूत्र(माध्यम) कोई हो। आजकल सोशल मीडिया, सोशल साइट्स, सोशल नेटवर्किंग इतना मजबूत हो चला है यदि पत्रकार थोड़ा और सजग हो जाएं तो उनके तक बहुत सारी जानकारियां हासिल हो जाएगी, जो खबर का हिस्सा बन सकता है।
इधर कुछ वर्षों से देखने को मिल रहे हैं कि प्रिंट मीडिया भी अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। अब पल पल की जानकारियां पाठकों तक, अपने फॉलोवर्स तक पहुंचाने की होड़ में लगे हैं। अब तो सभी के हाथों में एंड्रॉयड स्मार्टफोन फोन उपलब्ध है। एक क्लिक करने पर देश दुनियाभर की जानकारी मिल रही है। इसलिए पत्रकार अब अपने विश्वनीयता बनाए रखने के लिए विश्वसनीय स्रोत(सूत्र) से मधुर संबंध बनाए रखने की चेष्टा करते रहते हैं।
जैसे ही कोई घटना घटित होती है, क्षण भर में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर खबरें आ जाती है। उस समय तक प्रशासन को ये बात पता भी नहीं होती है लेकिन खबर के माध्यम से उन्हें भी जानकारी प्राप्त हो जाती है और फिर वे सक्रिय हो जाते हैं। कभी कभार ऐसी स्थिति भी पत्रकारों के समक्ष उत्पन्न हो जाती है कि प्रशासन के पास सारी जानकारियां होती है लेकिन समय से जब खबर नहीं आती है तो पाठक वर्ग ही पत्रकार से सवाल कर बैठते हैं कि-अमुक खबर आज आपके अखबार में या सोशल साइट्स पर नहीं देखने को नहीं मिले। तब पत्रकार की उस खबर के प्रति भूख इतनी प्रबल हो जाती है कि आखिर ये खबर हमसे कैसे छूट गई। ऐसे में पत्रकार अपने सूत्रों से संपर्क कर कुछ जानकारी हासिल करने की कोशिश करने लगते हैं। जब जानकारियां हासिल हो जाती है तो उनकी भूख की ज्वाला शांत हो जाती है और फिर खबर सभी के सामने आ जाती है।
ऐसा अक्सर उन परिस्थितियों में होता है जब प्रशासन की कहीं न कही विफलता छिपी हुई होती है। इसलिए वे मीडिया से उस समय बातें छिपाने की कोशिश करते हैं जब तक वे इस कोशिश में रहते हैं कि बात सभी के सामने आ जाने पर उनकी नाकामी उजागर नहीं हो जाए। ठीक इसके विपरीत जब प्रशासन के पास कोई उपलब्धि होती है तो वे तुरंत इसकी जानकारी मीडिया हाउस को देते हैं। बस यहीं पर कभी मीडिया दोस्त के रूप में तो कभी दुश्मन की संज्ञा से नवाजे जाते हैं।
पिछले दिनों एक संस्थान में प्रशासन की विफलता सामने आती है। साथ साथ कई सफलता और उपलब्धि भी हाथ लगती है लेकिन उपलब्धि की जानकारी मीडिया हाउस को शेयर कर दी जाती है लेकिन विफलता की बात छिपा लेते हैं। यह संस्थान केंद्र सरकार के अधीन यहां कार्य कर रही है। जब विफलता के साथ साथ जुड़ी सफलता प्राप्त होने की बात है तो दूसरे दिन देर रात को संबंधित पदाधिकारी एक मीडिया हाउस के पत्रकार से कहते हैं- कल खबर(प्रेस विज्ञप्ति) जारी की जाएगी। अब भला पत्रकार क्या करे? ऐसे में यदि सोशल साइट्स पर खबर चला दी गई होती तो अन्य मीडिया हाउस के लोग प्रशासन से सवाल कर बैठते कि- हम आपके दुश्मन थे जो हमें जानकारी नहीं दी और वे दोस्त थे जिन्होंने खबर चला दी।
…अंत में
खबर रेलवे स्टेशन पर सक्रिय दलाल से जुड़ी हुई है। जो गलत करते हुए पकड़ा गया था लेकिन जो गलती हुई वो प्रशासन की विफलता या घालमेल को इंगित करता है और जिसने सफलता हासिल की उनसे व्यक्तिगत ‘खुन्नस’।
