देवब्रत मंडल

कहते हैं कि आदमी झूठ बोल सकता है लेकिन कागज सच बोल देता है। क्योंकि कागज दब सकता है पर मरता नहीं। इस सरकारी भवन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कई कहानी को अपने आप में समेटे हुए है, आइये आपको बताते हैं कि क्या सच है जो कागज पर है…
रेल अभियंत्रण विभाग के अधीन है थानाध्यक्ष का क्वाटर
ये सरकारी भवन है। वो भी केंद्र सरकार के अधीन रेल मंत्रालय का है। भवन कब और कैसे यह बिहार सरकार के गृह विभाग के अधीन है यह मालूम नहीं। क्योंकि कोई इस बारे में नहीं बता रहा है। यह भवन गया जंक्शन के अभियंत्रण विभाग के अधीन यानी इसी विभाग के देखरेख में है। इस सरकारी आवास को क्वाटर कहा जाता है। जिसमें गया रेल थाना के एसएचओ रहते हुए आ रहे हैं। जहां तक इसके किराया भुगतान की बात है तो इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाई।
निलंबित रेल थानाध्यक्ष ने कहा-क्वाटर छोड़ दिया है
जमानत पर जेल से बाहर आए इंस्पेक्टर राजेश कुमार सिंह ने magadhlive से एक संक्षिप्त वार्ता में बताया कि उन्होंने इस क्वाटर को छोड़ दिया है और वे अपने घर पर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सोना लूटकांड में वे निर्दोष हैं। बता दें कि 31 दिसंबर 2025 को इन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था और 24 जनवरी 2025 को इन्हें न्यायालय से जमानत मिल गई है।
आज इस क्वाटर के प्रवेश द्वार पर लगा है ताला
यह रेलवे क्वाटर गया के इंस्पेक्टर कॉलोनी में है। इस आवास की संख्या 699 है। फोर टाइप के इसी क्वाटर में श्री सिंह निलंबित होने के पहले तक रह रहे थे और रेल थाना के कार्यों और अपने दायित्वों का निष्पादन किया करते थे। फिलहाल इस आवास के मुख्य गेट पर ताला लगा हुआ है।
सरकारी दस्तावेजों में पूर्व रेल थानाध्यक्ष के ही नाम
जब magadhlive की टीम इस क्वाटर के बारे में पड़ताल शुरू की तो पता चला कि जिस अभियंत्रण विभाग के अधीन ये क्वाटर है, उस विभाग के सरकारी दस्तावेज पर पूर्व रेल थानाध्यक्ष संतोष कुमार के ही नाम पर आवंटित दिखाया जा रहा है। जबकि संतोष कुमार के स्थानांतरण के बाद इस पद पर दीप नारायण यादव, कमल किशोर सिंह भी कार्य कर चुके हैं और इनके बाद राजेश कुमार सिंह आए। परंतु इन सभी के नाम पर इस क्वाटर के आवंटन होने का जिक्र नहीं है।
पूर्व रेल थानाध्यक्ष ने बताई ये बात
इस संबंध में जब पूर्व रेल थानाध्यक्ष संतोष कुमार से magadhlive ने यह जानने की कोशिश की तो उन्होंने बताया कि अब उनके वेतन से इस क्वाटर का HRA(हाउस रेंट अलॉन्स) नहीं काटा जाता है। श्री कुमार फिलहाल रेल जिला पुलिस बल में नहीं हैं। उन्होंने इतना बताया कि जैसे ही किसी पुलिस पदाधिकारी का गया रेल थानाध्यक्ष के पद पर कार्य करने के लिए DO(जिलादेश निर्गत) होता है तो स्वतः यह क्वाटर उन्हीं के नाम से हो जाता है। परंतु अब तक ऐसा नहीं हुआ है तो मेरी कोई गलती नहीं।
आखिर क्यों नहीं उत्तराधिकारी के नाम बदले गए
बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब संतोष कुमार के बाद तीन थानाध्यक्ष की पदस्थापना गया रेल थानाध्यक्ष के पद पर होती गई तो रेल अभियंत्रण विभाग ने क्यों नहीं आते गए एसएचओ का नाम अपने सरकारी दस्तावेज पर इसके उत्तराधिकारियों के नाम में परिवर्तन किया?
आईओडब्ल्यू ने कहा-इस बारे में पता करके ही कुछ कहेंगे
अभियंत्रण विभाग के कार्य निरीक्षक जिन्हें इंस्पेक्टर कॉलोनी में बने आवासों की देखरेख की जिम्मेवारी सौंपी गई है, उनसे जब इस प्रकार की होती चली आ रही गलतियों के को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि इधर कुछ समय पहले ही इंस्पेक्टर कॉलोनी का प्रभार सौंपा गया है, इसलिए इस बारे में वे विशेष रूप से कुछ नहीं बता पाएंगे। उन्होंने कहा कि इस बारे में पता करने के बाद ही कुछ बताने की स्थिति में होंगे।
…और अंत में
कई सालों से बिजली का बिल भी जमा नहीं हो रहा
इस क्वाटर नंबर 699 में खपत हो रही बिजली के एवज में विपत्र के भुगतान के बारे में जब रेलवे के विद्युत विभाग से जानकारी प्राप्त की गई तो पता चला कि लंबे समय से इस क्वाटर के बिजली बिल का भुगतान नहीं हो रहा है, वहीं रेल थाना भवन का भी बिजली का बिल बकाया चला आ रहा है।
