
अमित कुमार की कलम से
मगध लाइव हर उस समस्याओं पर पैनी निगाह रखती है, जो आमजन के हितों से जुड़ी होती है। ये अलग बात है इस महत्वपूर्ण बातों की ओर जिले के संबंधित लोगों के नजरों से ओझल हो गई है लेकिन एक सजग नागरिक के साथ जिम्मेदार पत्रकार अमित कुमार ने इस विषय को प्रमुखता से सच को सामने लाने की कोशिश की है। जिसका साथ magadhlive ने देंते हुए इस रिपोर्ट को उनकी ही कलम से हू ब हू जनता के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है। उम्मीद है कि बहुत शीघ्र ही इस भूल से प्रशासन सबक लेकर इसमें सुधार कराएगा।
गया जिला प्रशासन द्वारा आधिकारिक हेल्पलाइन नंबरों में बदलाव किए जाने के बावजूद शहर में अब भी पुराने नंबरों का प्रचार-प्रसार जारी है। खासकर गया जिला समाहरणालय के सामने ट्रैफिक पुलिस के लिए बनाए गए बैठने के स्थान और सूचना बोर्डों पर पुराने नंबरों के स्टिकर चिपके हुए दिखाई दे रहे हैं। यही स्थिति शहर के अन्य प्रमुख स्थानों पर भी देखी जा रही है।
गौरतलब है कि गया एक अंतरराष्ट्रीय महत्व का शहर है, जहां हर वर्ष बड़ी संख्या में देश-विदेश से पर्यटक और श्रद्धालु पहुंचते हैं। महाबोधि मंदिर जैसे विश्वप्रसिद्ध स्थल के कारण यहां विदेशी पर्यटकों का भी लगातार आगमन होता रहता है। ऐसे में यदि आपातकालीन या प्रशासनिक संपर्क नंबरों में बदलाव हो चुका है और जमीनी स्तर पर अब भी पुराने नंबरों का ही प्रचार किया जा रहा है, तो यह प्रशासनिक लापरवाही का संकेत माना जा रहा है।
स्थानीय लोगों के साथ साथ आमजन का कहना है कि कई बार जरूरत पड़ने पर जब वे पुराने नंबरों पर संपर्क करते हैं तो कॉल नहीं लगती या नंबर अमान्य बताया जाता है। इससे न केवल आम नागरिकों को परेशानी होती है, बल्कि बाहर से आने वाले यात्रियों को भी असुविधा का सामना करना पड़ता है।
प्रशासन द्वारा नंबर बदले जाने की सूचना भले ही आधिकारिक माध्यमों से जारी कर दी गई हो, लेकिन शहर में लगे बोर्ड, होर्डिंग और स्टिकरों को समय पर अपडेट नहीं किया गया है। सवाल यह उठता है कि जब गया जैसे अंतरराष्ट्रीय पहचान वाले शहर में सूचना तंत्र की यह स्थिति है, तो आमजन तक सही जानकारी कैसे पहुंचेगी?
जनता और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि जिला प्रशासन तत्काल संज्ञान लेते हुए शहर भर में लगे पुराने नंबरों को हटाकर नए नंबरों का स्पष्ट और एकरूप प्रचार सुनिश्चित करे, ताकि किसी भी आपात स्थिति में नागरिकों और पर्यटकों को सही और त्वरित सहायता मिल सके।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर विषय पर कब तक कार्रवाई करता है और व्यवस्था को दुरुस्त करता है।
