देवब्रत मंडल

लोग अब खुलकर कहने लगे हैं कि मैं बागेश्वरी गुमटी पर बन रहे आरओबी को लेकर “ज्यादा एग्रेसिव” हूं।
मानता हूं। क्योंकि कुछ जख्म ऐसे होते हैं जो भुलाए नहीं भूलते।
क्रिष की मौत आज भी गूंजती है
याद है कुछ समय पहले की बात है। शाम ढल चुकी थी। पावरगंज मोहल्ले का एक मासूम बच्चा क्रिष साइकिल से रेल पटरी पार कर रहा था। बागेश्वरी गुमटी के पास ट्रेन की चपेट में आ गया और वहीं दम तोड़ दिया। वो अपने पिता अशोक प्रजापति का इकलौता बेटा था।
क्रिष की मौत ने पूरे गया को रुला दिया था। उस दिन हर आंख नम थी और हर जुबान पर एक ही बात थी – “अब हर हाल में बागेश्वरी पर आरओबी बनना चाहिए”।

इससे पहले भी और इसके बाद भी कई जानें इसी गुमटी और इसके आसपास ट्रेन की चपेट में जा चुकी हैं।
आंदोलन पहले भी हुए। लेकिन क्रिष के पिता का वो करुणा भरा संदेश आज भी मेरे जेहन में गूंजता है।
कलम उठी तो मिशन बन गया
मैं पेशे से पत्रकार हूं, लेकिन उससे पहले एक आम नागरिक हूं। सीने में दिल धड़कता है। उसी दर्द ने कलम उठाने पर मजबूर किया।
सोचा – समाज के लिए कुछ ऐसा लिखो कि एक बड़ी लकीर खिंच जाए।
ताकि अब कोई मां का लाल, कोई पिता का सहारा रेल पटरी पर अपनी जान न गंवाए।
बस उसी दिन से बागेश्वरी आरओबी की मांग को अपना मिशन बना लिया। बदनामी सही, ताने सही, लेकिन पीछे नहीं हटे।
अब मिशन सफलता की राह पर

आज जब भूमि पूजन के 5 महीने बाद पीलर के गड्ढे खुद रहे हैं, अधिकारियों का आना-जाना शुरू हुआ है, तो लगता है वो मिशन अब सफलता की राह पर है।
बदनामी और नेकनीयती के बीच हुए इस संघर्ष में magadhlive.news कहां तक सफल रही है, इसका फैसला मैं नहीं करूंगा।
फैसला आप करेंगे – गया की जनता करेगी।
बस! इतना तय है कि अब और कोई क्रिष अपनी जान नहीं गंवाएगा।
