देवब्रत मंडल

गया।
पिछले दिनों एक ही दिन में गया जंक्शन और इसके आसपास चलती व प्लेटफॉर्म पर खड़ी ट्रेनों में 3 आपराधिक मामले सामने आए। तीनों घटनाओं की शिकायतें दर्ज की गई हैं। इसके अलावे भी कई मामले चलती ट्रेन या प्लेटफॉर्म पर के सामने आए लेकिन मामला सिर्फ अपराध का नहीं, बल्कि खबर के प्रसारण और उसके बाद बनने वाले दबाव का भी है।
डिजिटल युग में खबर सेकंडों में वायरल
‘डिजिटल इंडिया’ के दौर में रेलवे खुद यात्रियों की सुविधा के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म चला रहा है। स्टेशन से लेकर ट्रेन तक इंटरनेट की पहुंच है। इसी का नतीजा है कि कोई भी घटना हो, उसका लाइव वीडियो, रील या फोटो चंद मिनटों में X, Instagram, Facebook और WhatsApp पर वायरल हो जाता है।
रेलकर्मी से लेकर अधिकारी तक अब अपने काम के वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं। मीडिया भी पीछे नहीं। आज बड़े अखबार और न्यूज चैनल भी सोशल मीडिया की खबरों पर ही निर्भर दिखते हैं। कॉपी, कट, एडिट और पेस्ट का दौर चल रहा है।
अपराध की खबर आते ही ‘दबाव का खेल’ शुरू
लेकिन जैसे ही कोई आपराधिक घटना सोशल मीडिया पर आती है, संबंधित अधिकारियों और एजेंसियों के कान खड़े हो जाते हैं। अखबार में अगले दिन छपने वाली खबर अब मिनटों में वायरल हो जाती है।
यहीं से असल खेल शुरू होता है।
सोशल मीडिया एक्टिविस्ट और न्यूज बनाने वालों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाने लगता है। ये दबाव कई रूप में आता है – धमकियां, गालियां, और कभी-कभी “उपकृत” करने की पेशकश। बात कोर्ट-कचहरी तक पहुंच जाती है।
जवाबदेही बनाम अभिव्यक्ति की आजादी
आज प्रधानमंत्री से लेकर गांव के ग्रामीण तक अपनी बात सोशल मीडिया के जरिए रख रहे हैं। ऐसे में सवाल ये है कि क्या अपराध की खबर दिखाना गुनाह है? या फिर सिस्टम की जवाबदेही तय करना जरूरी है?
रेलवे जैसी सार्वजनिक संस्था में पारदर्शिता जरूरी है। यात्रियों की सुरक्षा सबसे पहले है। अगर सोशल मीडिया के कारण प्रशासन हरकत में आता है, तो इसे सकारात्मक ही माना जाना चाहिए।
लेकिन खबर दिखाने वालों को डराना, धमकाना और दबाना लोकतंत्र और प्रेस की आजादी पर हमला है।
निष्कर्ष:
गया जंक्शन पर हुई 3 घटनाएं सिर्फ FIR तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। रेल प्रशासन को चाहिए कि वो सोशल मीडिया पर आने वाली शिकायतों को अवसर माने, न कि खतरा। क्योंकि आज के दौर में कैमरा हर यात्री की जेब में है और खबर अब किसी के रोकने से नहीं रुकेगी।
