ट्विटर (X) पर यात्री की शिकायत—“हर दिन ट्रेन में शराब तस्करी”, नंबर मांगने पर सुरक्षा को लेकर डर; आरपीएफ-जीआरपी की कार्यप्रणाली पर सवाल

ब्यूरो रिपोर्ट | धनबाद-कोडरमा-गया ग्रैंडकॉर्ड
धनबाद-कोडरमा-गया ग्रैंडकॉर्ड रेलखंड पर चलने वाली ट्रेन संख्या 13545 एक बार फिर सवालों के घेरे में है। एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व ट्विटर) पर लगातार हो रही अवैध शराब तस्करी की शिकायत करते हुए यात्रियों को हो रही परेशानियों का मुद्दा उठाया है। शिकायत में रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और रेल अधिकारियों को टैग कर तत्काल कार्रवाई की मांग की गई।
शिकायत रेलवे अधिकारियों तक पहुंचने के बाद संबंधित अधिकारी ने व्यक्ति से 139 हेल्पलाइन पर औपचारिक शिकायत दर्ज कराने और मोबाइल नंबर साझा करने को कहा। यहीं से मामला संवेदनशील हो गया।
“नंबर सार्वजनिक हुआ तो खतरा बढ़ेगा” — शिकायतकर्ता
शिकायतकर्ता ने साफ कहा कि यदि उनका मोबाइल नंबर सार्वजनिक हुआ तो उनकी पहचान उजागर हो सकती है, जिससे उन्हें जान-माल का खतरा हो सकता है। उनका आशंका है कि कहीं स्थानीय स्तर पर कार्यरत सुरक्षा एजेंसियां ही उनके खिलाफ प्रतिकूल कार्रवाई न कर दें।
यह सवाल खड़ा करता है—क्या शिकायतकर्ता की गोपनीयता की रक्षा करना सिस्टम की जिम्मेदारी नहीं है?
बार-बार पकड़ी जा चुकी है तस्करी
यह कोई पहला मामला नहीं है। वर्ष 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बाद से ट्रेनों के जरिए अवैध शराब की तस्करी लगातार सामने आती रही है। आरपीएफ और जीआरपी की संयुक्त कार्रवाई में धनबाद-कोडरमा-गया रेलखंड पर कई बार शराब की खेप पकड़ी गई है और संबंधित मामलों में प्राथमिकी भी दर्ज हुई है।
तस्करी के पीछे संगठित नेटवर्क की आशंका
स्थानीय सूत्रों और पूर्व मामलों के आधार पर यह संकेत मिलते रहे हैं कि इस अवैध कारोबार के पीछे एक संगठित माफिया नेटवर्क सक्रिय है। ट्रेनें इनके लिए सुरक्षित और नियमित ट्रांसपोर्ट चैनल बनती जा रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल: जब्त नहीं होते मोबाइल फोन?
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि शराब तस्करी में गिरफ्तार किए गए आरोपियों के मोबाइल फोन अक्सर जब्ती सूची में शामिल नहीं होते। जबकि आज के समय में मोबाइल फोन किसी भी नेटवर्क, संपर्क और पूरे सिंडिकेट की जानकारी का सबसे बड़ा स्रोत हो सकता है।
क्या मोबाइल जब्त नहीं करना जांच को सीमित करने का संकेत है?
क्या इससे बड़े नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश नहीं हो रही?
जांच हो तो खुल सकते हैं बड़े चेहरे। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि वरीय पुलिस और रेल अधिकारी इस एंगल से गहन जांच शुरू करें, तो कई ऐसे चेहरे सामने आ सकते हैं जो अब तक पर्दे के पीछे रहकर इस अवैध कारोबार को संरक्षण दे रहे हैं—या संभव है कि कुछ जिम्मेदार तंत्र के भीतर ही सांठगांठ हो।
जरूरी है सिस्टम में भरोसा कायम करना
यह मामला सिर्फ शराब तस्करी का नहीं, बल्कि सिस्टम में आम नागरिक के भरोसे का भी है। यदि कोई व्यक्ति जोखिम उठाकर सूचना देता है, तो उसकी पहचान सुरक्षित रखना और निष्पक्ष जांच करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। ग्रैंडकॉर्ड रेलखंड पर बढ़ती शिकायतें यह संकेत दे रही हैं कि समस्या सतही नहीं, बल्कि गहरी है। अब जरूरत है पारदर्शी जांच, जवाबदेही तय करने और शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की—ताकि कानून का भय अपराधियों में हो, न कि सूचना देने वालों में।
