देवब्रत मंडल

गया, 13 जून 2026। रामपुर थाना कांड संख्या 115/26 की पीड़िता ने जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पीड़िता काल्पनिक नाम कविता कुमारी ने मुख्यमंत्री, गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव, DGP बिहार, IG मगध, DM गया और SSP गया को आवेदन देकर उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
क्या है पूरा मामला
पीड़िता का आरोप है कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद से ही अनुसंधानकर्ता महिला दारोगा ज्योति कुमारी का व्यवहार संदिग्ध है। बैंक पासबुक, मेडिकल रिपोर्ट समेत सभी दस्तावेज देने के बावजूद उन पर और परिवार पर दबाव बनाया जा रहा है।
पीड़िता के 5 गंभीर आरोप
1. मेडिकल के बाद आरोपी के घर ले जाने का आरोप
पीड़िता ने आवेदन में लिखा है कि मेडिकल परीक्षण के उपरांत उसे बिना चेहरा ढके अभियुक्त के घर ले जाया गया। विरोध करने पर अभद्र व्यवहार किया गया और धमकाया गया। पीड़िता ने मांग की है कि रास्ते के सीसीटीवी फुटेज और मोहल्ले के लोगों से पूछताछ कर इसकी जांच हो।
2. बुजुर्ग नानी को धमकी
पीड़िता की वृद्ध नानी को फोन कर कानूनी कार्रवाई और जेल भेजने की धमकी दी गई, जिससे वे मानसिक रूप से परेशान हैं।
3. जांच की दिशा भटकाने का आरोप
पीड़िता का कहना है कि कोर्ट में बयान देने के बावजूद जांच को बार-बार मूल घटना से हटाकर CDR व अन्य पहलुओं में उलझाया जा रहा है। आशंका है कि इससे मुख्य आरोपी को फायदा पहुंचाया जा रहा है।
4. दो माह बाद भी चार्जशीट नहीं
अभियुक्तों की गिरफ्तारी को 2 महीने से ज्यादा हो गए, लेकिन अब तक आरोप-पत्र दाखिल नहीं किया गया। पीड़िता को आशंका है कि विलंब कर केस को कमजोर किया जा रहा है।
5. समझौते का दबाव
FIR के बाद से आरोपी पक्ष केस वापस लेने और समझौता करने का दबाव बना रहा है। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष धमकियां दी जा रही हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
पीड़िता की मांग
- कांड की उच्चस्तरीय समीक्षा हो
- महिला IO के कार्यकलाप की जांच हो
- मेडिकल के बाद आरोपी के घर ले जाने की घटना की स्वतंत्र जांच हो
- परिवार को पुलिस सुरक्षा मिले
- समयबद्ध चार्जशीट दाखिल कराई जाए
- जांच में विलंब के लिए दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो
पीड़िता ने कहा, “मैंने हर स्तर पर सहयोग किया है। फिर भी मुझे न्याय प्रभावित होने का डर है। मुझे बिहार पुलिस और न्याय व्यवस्था पर भरोसा है।”
क्या कहते हैं नियम
BNSS की धारा 193 के तहत गिरफ्तारी के 60/90 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल करना अनिवार्य बताया गया है। वहीं POCSO और महिला अपराध के मामलों में संवेदनशीलता बरतना जरूरी है। पीड़िता को आरोपी के सामने ले जाना सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के खिलाफ है।
