गया जंक्शन पर ‘शोले’ स्टाइल में चल रहा पानी का अवैध धंधा: ‘बीरू-ओझा जी’ की जोड़ी, ‘भगत जी’ का गोदाम, ‘मैडम’ की जमीन

Deobarat Mandal

डेल्हा साइड में डीप फ्रीजर लगाकर ठंडा किया जा रहा पानी, अवैध वेंडरों से बेच रहे बोतल; स्टॉल संचालकों का आरोप- सिपाही और वाणिज्य विभाग के पर्यवेक्षक की मिलीभगत

देवब्रत मंडल| गया

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गया: बिहार के गया जंक्शन पर अवैध कारोबार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अब यहाँ पानी बेचने के धंधे में भी ‘शोले’ फिल्म के किरदारों की एंट्री हो गई है। आरोप है कि यहाँ ‘बीरू’ पानी की टंकी पर चढ़कर ‘वसंती’ के लिए नहीं, बल्कि एक ‘ओझा जी’ के साथ मिलकर यात्रियों के लिए ‘ओझाई’ कर रहा है।

दरअसल, गया में भीषण गर्मी के बीच यात्रियों की प्यास का फायदा उठाकर प्लेटफॉर्म पर अवैध रूप से पानी की बोतल बेचने का संगठित गिरोह सक्रिय है। अधिकृत एजेंसी द्वारा स्टॉलों पर रेल नीर उपलब्ध कराए जाने के बावजूद, हर प्लेटफॉर्म पर अवैध वेंडर खुलेआम बोतलें बेच रहे हैं।

‘मैडम’ की जमीन, ‘भगत जी’ का गोदा


सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, गया जंक्शन के डेल्हा साइड में रहने वाली एक ‘मैडम’ की जमीन को किराए पर लिया गया है। इस भूखंड पर ‘भगत’ नामक व्यक्ति ने कमरे का निर्माण कर कई डीप फ्रीजर लगा रखे हैं। इन्हीं फ्रीजर में पानी की बोतलों को ठंडा किया जाता है।

‘ओझा जी-बीरू’ की टीम करती है सप्लाई


बताया जाता है कि यहीं से ‘ओझा जी’ की मदद से ‘बीरू’ और उसके साथी ठंडे पानी की बोतलों को प्लेटफॉर्म पर लाते हैं। इसके बाद अवैध वेंडरों के जरिए ट्रेनों और प्लेटफॉर्म पर यात्रियों को बेचा जाता है। स्थानीय भाषा में इसे ‘पानी के बोतल की भूत की ओझाई’ कहा जा रहा है।

स्टॉल संचालकों में आक्रो


गया जंक्शन पर कई अधिकृत स्टॉल संचालित हैं, जिन्हें रेल प्रशासन को किराया और बिजली बिल देना पड़ता है। इसके बावजूद उनकी बिक्री न के बराबर है। एक स्टॉल संचालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमारे यहाँ से रेल नीर कम बिकता है। जितना माल हम एक दिन में नहीं बेच पाते, उतना अवैध वेंडर कुछ घंटों में बेच देते हैं।”

सिपाही और पर्यवेक्षक पर शक की सुई


स्टॉल संचालकों का आरोप है कि इस अवैध धंधे के पीछे एक सिपाही की भूमिका सामने आ रही है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस धंधे को रोकने की जिम्मेदारी जिन पर है, वाणिज्य विभाग के उसी पर्यवेक्षक स्तर के रेलकर्मी की भूमिका पर भी शक की सुई घूम रही है।

फिलहाल रेल प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन यात्रियों की मजबूरी और रेल राजस्व को हो रहे नुकसान को देखते हुए इस ‘ओझाई’ पर जल्द लगाम लगाना जरूरी है।

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