1974 से 2026 तक: देश फिर एक छात्र आंदोलन की दहलीज पर? जेपी आंदोलन और donam बांगचुक के अनशन से उठी नई बहस

Deobarat Mandal

देवब्रत मंडल

52 साल पहले ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा था, आज छात्रों के मुद्दों पर फिर सड़कों पर उतरने की चर्चा तेज

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बिहार की राजनीति में छात्र आंदोलनों का हमेशा से महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वर्ष 1974 का जेपी आंदोलन केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीति को बदल देने वाला आंदोलन माना जाता है। अब वर्ष 2026 में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम बांगचुक के आमरण अनशन से उपजा छात्र आंदोलन एक बार फिर बिहार में छात्र राजनीति को चर्चा के केंद्र में ले आया है। हालांकि दोनों आंदोलनों की परिस्थितियां, मुद्दे और राजनीतिक संदर्भ अलग हैं, फिर भी कई लोग इनके बीच समानताएं और अंतर तलाश रहे हैं।

1974: जब छात्रों ने बदली देश की राजनीति

1974 में बिहार के छात्र महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शिक्षा व्यवस्था की बदहाली से परेशान थे। शुरुआत पटना विश्वविद्यालय के छात्रों के आंदोलन से हुई, लेकिन देखते ही देखते यह पूरे बिहार में फैल गया।
18 मार्च 1974 को बिहार विधानसभा के घेराव के दौरान हिंसक झड़पें हुईं और कई छात्रों की जान चली गई। इसके बाद छात्रों के आग्रह पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया। उन्होंने एक शर्त रखी कि आंदोलन पूरी तरह अहिंसक होगा।
5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान से जयप्रकाश नारायण ने “संपूर्ण क्रांति” का आह्वान किया। उनका उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि राजनीति, शिक्षा, समाज और प्रशासन सहित पूरे तंत्र में बदलाव लाना था। यही आंदोलन आगे चलकर इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय जन आंदोलन बना और 1975 के आपातकाल तथा बाद में जनता पार्टी के गठन की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

2026: सोनम बांगचुक के अनशन से फिर सक्रिय हुई छात्र राजनीति

2026 में सोनम बांगचुक के आमरण अनशन ने एक बार फिर छात्रों के बीच व्यापक चर्चा पैदा कर दी। अनशन के बाद विभिन्न शिक्षण संस्थानों के छात्र संगठनों ने आंदोलन का समर्थन करना शुरू किया और कई स्थानों पर प्रदर्शन, धरना तथा विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए।
इस आंदोलन के केंद्र में छात्रों से जुड़े समकालीन मुद्दे हैं। आंदोलन के समर्थकों का कहना है कि यह छात्रों के अधिकारों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों को लेकर शुरू हुआ है। वहीं, इसके विरोधी इसे राजनीतिक रंग देने का आरोप भी लगा रहे हैं।

दो दौर, दो परिस्थितियां

1974 और 2026 के आंदोलनों के बीच कुछ समानताएं दिखाई देती हैं। दोनों की शुरुआत छात्रों की असंतुष्टि से हुई और दोनों में युवाओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिल रही है। दोनों आंदोलनों में नेतृत्व की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।
लेकिन दोनों के बीच बड़े अंतर भी हैं। 1974 का आंदोलन राज्यव्यापी होते-होते राष्ट्रीय आंदोलन बन गया था, जिसका एजेंडा व्यापक राजनीतिक परिवर्तन था। वहीं 2026 का आंदोलन फिलहाल छात्र हितों और शिक्षा संबंधी मांगों तक सीमित माना जा रहा है। भविष्य में इसका स्वरूप क्या होगा, यह आने वाले समय में तय होगा।

बदल चुका है आंदोलन का तरीका

1974 में आंदोलन का मुख्य आधार जनसभाएं, पदयात्राएं और प्रत्यक्ष जनसंपर्क था। सूचना का प्रसार अखबारों और मौखिक संपर्क से होता था।
आज सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और लाइव प्रसारण आंदोलन को तेजी से लोगों तक पहुंचा रहे हैं। कुछ घंटों में ही कोई भी मुद्दा राज्यव्यापी चर्चा का विषय बन सकता है।

क्या इतिहास दोहराएगा खुद को?

इतिहास कभी पूरी तरह दोहराया नहीं जाता, लेकिन उससे सीख जरूर मिलती है। 1974 का जेपी आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का निर्णायक अध्याय था। 2026 का छात्र आंदोलन अभी अपने शुरुआती चरण में है। यह कितना व्यापक होगा, क्या यह केवल छात्र मुद्दों तक सीमित रहेगा या आगे किसी बड़े सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन का रूप लेगा, इसका उत्तर आने वाला समय देगा।
फिलहाल इतना तय है कि देश की राजनीति में छात्र शक्ति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है और युवाओं की आवाज़ को नजरअंदाज करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होगा।

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