देवब्रत मंडल

गया जी। मोक्ष की धरती। ज्ञान की भूमि। भगवान विष्णु के चरणों से पवित्र हुई यह नगरी और भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त होने का साक्षी बना बोधगया। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु अपने पितरों के मोक्ष की कामना लेकर यहां आते हैं, तो दुनिया भर से बौद्ध अनुयायी भी इस धरती पर श्रद्धा अर्पित करने पहुंचते हैं।
रेल, सड़क और हवाई मार्ग से जुड़ा गया देश-दुनिया के लोगों का प्रमुख पड़ाव है। सबसे अधिक यात्री रेलमार्ग से यहां आते-जाते हैं। आधुनिक सुविधाओं से लैस किए जा रहे गया जंक्शन को अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेशन के रूप में विकसित किया जा रहा है। लेकिन इसी आधुनिकता के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने भीतर तक झकझोर दिया।
मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है। कोई नहीं जानता कि किसकी अंतिम सांस कब और कहां होगी। रेल यात्रा के दौरान यदि किसी यात्री की मौत हो जाती है तो रेलवे और रेल पुलिस निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई करती है। पंचनामा, यूडी केस, पोस्टमार्टम और पहचान होने तक शव को सुरक्षित रखना—यह सब केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मृतक के प्रति समाज की अंतिम जिम्मेदारी भी है।
इसी प्रक्रिया के दौरान MagadhLive की टीम ने जो देखा, उसने कई सवाल खड़े कर दिए।

ट्रेन संख्या 12802 से यात्रा कर रहे ओडिशा निवासी फ्रांसिस (पहचान पत्र के अनुसार) की तबीयत अचानक बिगड़ गई। ड्यूटी पर तैनात डिप्टी एसएस (कॉमर्शियल) प्रदीप लोहरा और पीए संजीत कुमार सिंह ने तत्काल पहुंचकर सीपीआर दिया। हर संभव प्रयास हुआ, लेकिन जिंदगी नहीं बच सकी। रेलवे चिकित्सक ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
इसके बाद घटनाक्रम नियमानुसार आगे बढ़ा। पहले शव को पार्सल कार्यालय के एक कमरे में रखा गया। बाद में पोस्टमार्टम कराया गया और पहचान होने तक उसे गया जंक्शन के प्लेटफॉर्म नंबर-1 के दिल्ली छोर पर बने उस कमरे में रखा गया, जिसे शवगृह कहा जाता है।
जब MagadhLive की टीम वहां पहुंची, तो सामने का दृश्य शब्दों में बयां करना आसान नहीं था।
कमरे के भीतर शव रखा था। आसपास बड़े-बड़े चूहे घूम रहे थे। कुछ चूहे शव के बेहद करीब तक पहुंच रहे थे। कमरे की स्थिति ऐसी थी कि किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का मन विचलित हो जाए। वहां मौजूद माहौल यह सवाल पूछ रहा था कि क्या किसी इंसान की अंतिम यात्रा का सम्मान इतना भी कठिन है?
वह शव केवल एक अज्ञात या मृत यात्री नहीं था। वह किसी मां की संतान था, किसी पत्नी का जीवनसाथी, किसी बच्चे का पिता, किसी परिवार की दुनिया।
शायद उस परिवार को यह भी नहीं पता होगा कि उनका अपना, घर लौटने से पहले किन परिस्थितियों में पड़ा है।
गया जी दुनिया को मोक्ष का संदेश देता है। यहां लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए हजारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं। ऐसे शहर के प्रमुख रेलवे स्टेशन पर यदि शवों के संरक्षण की व्यवस्था ही मानवीय गरिमा के अनुरूप न हो, तो यह केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि संवेदनाओं पर भी प्रश्नचिह्न है।
आज गया जंक्शन के आधुनिकीकरण पर लगभग 400 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। यात्रियों के लिए अत्याधुनिक सुविधाएं विकसित हो रही हैं। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन क्या इसी परियोजना में एक ऐसा आधुनिक, स्वच्छ और सुरक्षित शवगृह भी नहीं होना चाहिए, जहां किसी मृत यात्री के पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक रखा जा सके?
MagadhLive का उद्देश्य किसी संस्था या व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की ओर ध्यान आकर्षित करना है, जहां सुधार की सबसे अधिक आवश्यकता है।
उम्मीद है कि रेलवे प्रशासन, रेल पुलिस और संबंधित विभाग इस व्यवस्था की गंभीर समीक्षा करेंगे, ताकि भविष्य में किसी भी मृत यात्री की पार्थिव देह ऐसी परिस्थितियों में रखने की नौबत न आए।
क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसके आधुनिक भवनों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे असहाय और मौन नागरिक—एक मृत इंसान—को कितना सम्मान देता है।
